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Published on 23 Sep 2014 | over 2 years ago

Ghazal - Ye Na Thi Humari Kismat
Lyrics - Mirza Ghalib
Singer - Ali Raza
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ये ना थी हमारी क़िस्मत के विसाल-ए-यार होता,
अगर और जीते रहते, यही इंतजार होता.

तेरे वादे पर जिये हम, तो ये जान झूठ जाना,
के खुशी से मर ना जाते, अगर 'ऐतबार' होता.

तेरी नाज़ुकी से जाना के बँधा था 'एहेद-ए-बोधा',
कभी तू ना तोड़ सकता, अगर उस्तुवार होता.

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीम कश को,
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता.

ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह,
कोई चारासाज़ होता, कोई गम-गुसार होता.

रग-ए-संग से टपकता, वो लहू की फिर ना थमता,
जिसे गम समझ रहे हो, ये अगर शरार होता.

ग़म अगरचे जान-गुलिस हैं , पे कहाँ बचें के दिल हैं,
ग़म-ए-इश्क़ गर ना होता, ग़म-ए-रोज़गार होता.

कहूँ किस से मैं के क्या हैं शब-ए-ग़म बुरी बला हैं,
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता.

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए क्यों ना गर्क-ए-दरिया,
ना कभी जनाज़ा उठता, ना कहीं मज़ार होता.

उसे कौन देख सकता के यगान हैं वो यक्ता,
जो दूई की बू भी होती, तो कहीं दो चार होता.

ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान 'ग़ालिब',
तुझे हम वली समझते, जो ना बादा-ख्वार होता.
- 'ग़ालिब'
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