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Published on 21 Mar 2012 | over 6 years ago

जिगर साब' की यह गजल, उस्ताद बहाउद्दीन खान साहिब की आवाज में, कुछ अलग से कहना अनावश्यक होगा!

हैरते-इश्क नहीं, शौक जुनूं जोश नहीं
बेहिजाबाना चले आओ मुझे होश नहीं.
रिंद जो मुझको समझते हैं उन्हे होश नहीं
मैक़दासाज़ हूं मै मैक़दाबरदोश नहीं.
कह गयी कान में आकर तेरे दामन की हवा
साहिबे-होश वही है के जिसे होश नहीं.
कभी उन मदभरी आँखों से पिया था इक जाम
आज तक होश नहीं होश नहीं होश नहीं.
...
मिल के जिस दिन से गया है कोई एक बार `जिगर'
मुझको ये बहम है कैसे मेरा आगोश नहीं.
By www.facebook.com/BahauddinKhanQawwal
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